Kahani with Moral in Hindi इंसानियत के बीज

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लेखक: प्रेम कुमार

परिचय

Kahani with Moral in Hindi मेरे बचपन की कहानी है। उस वक्त मेरी उम्र 8 से 10 साल की होगी। मैं अपने दादा दादी के साथ जैनामोड (बोकारो) में सरस्वती पूजा के अवसर पर आयोजित मेला देखने के लिए गया था। पूजा पंडाल में मूर्तियों के दर्शन करने के बाद जब बाहर निकल रहा था। मैंने देखा कि 3 बच्चे अपनी मां के साथ पंडाल के किनारे भीख मांग रहे थे। वह फटे हाल में थे। एक भी बच्चे ने हाफ पेंट के अलावा कुछ भी नहीं पहना था।  मां के शरीर पर साड़ी कई जगह से फटी हुई थी। उनका पेट भूख के कारण अंदर धसा हुआ था। बच्चों के नंगे बदन पर पसलियां गिनी जा सकती थी। कटोरा सामने रखा हुआ था जिसमें 50 पैसे और ₹1 के कुछ सिक्के थे।

बगल में उसका पिता शराब पीकर लेटा हुआ था। उसके इर्द-गिर्द कुछ कुत्ते घूम रहे थे। एक कुत्ता तो उसके शरीर पर मूत्र विसर्जन भी कर रहा था।

चिंतन की स्थिति ( hindi stories for kids with moral )

इस स्थिति को देखकर मैंने अपनी दादी से पूछा, “ये भीख क्यों मांग रहे हैं?”

दादी ने जवाब दिया, “उनका पिता शराब पीकर पड़ा है, कुछ काम नहीं करता, घर में खाने के लिए कुछ भी नहीं है इसलिए यह सब भीख मांग रहे हैं।”

मैंने मन ही मन निश्चय किया कि जीवन में मैं कभी भी शराब नहीं पीना है। फिर मैंने दादी कहा, “एक ₹10 का नोट उसके कटोरे में डाल देता हूं।”

दादी मना कर दी, बोली, “दो मैं दे दूंगी।”

मैंने दादी से कहा, “मैं उनके लिए मिठाई खरीद लेता हूं।”

दादी ने मिठाई खरीदी और सारी मिठाई अपने थैले में ही डाल ली।

मैंने दादी से पूछा, “उन लोगों को मिठाई क्यों नहीं दी।”

दादी बोली दादा जी खरीद कर पहुंचा दिए। दादा जी को इस घटना की जानकारी नहीं थी।

मैंने दादा जी से पूछा, “आपने जो मिठाई उन गरीब बच्चों को दिए तो क्या सभी बच्चे मिठाई खाए थे।” दादा जी मेरी बातों को समझ नहीं पाए और पूछे, “कौन सी मिठाई और किन गरीब बच्चों को देना था।”

मैंने कहा, “वे जो मेले में आए थे और पंडाल के किनारे भीख मांगने के लिए बैठे थे।”

दादाजी ने इंकार कर दिया, “नहीं, मैं कुछ नहीं जानता।”

Kahani with Moral in Hindi बच्चों के लिए शिक्षाप्रद होती है और उनको संस्कारी भी बनाता है।

नाराजगी

यह जानकर कि दादाजी ने उन बच्चों को कोई भी मिठाई नहीं दिए थे मैं बहुत ही रोने लगा और दादी को भला बुरा कहने लगा। मुझे रोते देखकर दादा दादी समझाने लगे कि बेटे केवल वह एक झांकी था और मनोरंजन के लिए पंडाल के किनारे सजाया गया था। पर नाराजगी के कारण मुझे लग रहा था कि यह सारे मुझे सहानुभूति दे रहे हैं ताकि मैं चुप हो जाऊं लेकिन मैंने मां पापा की भी बात नहीं मानी और खाना खाने से इंकार कर दिया। मुझे नाराज देखकर दादाजी ने कहा कि मैं कल जेना मोड बुआ के यहां जाऊंगा उस वक्त मैं मिठाई उन बच्चों के लिए लेता जाऊंगा अभी तुम खाना खा लो। फिर बड़ी मुश्किल से मैं खाना खाने के लिए राजी हुआ। उन दिनों मेरे पापा काम के सिलसिले से जैना मोड़ आया जाया करते थे।

मन परिवर्तन

इस घटना के बाद मैं जब भी खाना खाने के लिए बैठता हूं तो एक कटोरी चावल उन बच्चों के लिए भी रख दिया करता था और पापा को कहता था कि जैनामोड़ जाते वक्त यह भोजन उन बच्चों को दे दीजिएगा। यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा। घर वाले समझ गए थे कि मैं समझने वाला नहीं हूं तो पापा ने एक तरकीब निकाली।

एक दिन पापा जैनामोड़ मोड़ से आए और आंगन में मुझे कटोरे का चावल जो मां पापा को चुपके से दे दी थी घर पहुंचने के बाद मुझे देते हुए कहते हैं कि अब वह लोग भीख नहीं मांगते हैं और ठीक-ठाक जिंदगी बिता रहे हैं उन्होंने कटोरे का चावल नहीं लिया। मैंने पापा से पूछा कि क्या वे लोग अच्छे अच्छे कपड़े पहने थे। इस पर पापा ने कहा, “हां! किसी ने उन्हें अच्छे अच्छे कपड़े पहनने के लिए दिया। मुझे थोड़ी खुशी हुई और उस दिन से मैं कटोरी में चावल रखना बंद कर दिया।”

और भी Kahani with Moral in Hindi चाहिये तो आप हमें अवश्य लिखें। bhagwan ki kahani पढेंं।

दया की भावना

कुछ दिनों के बाद हमारे घर एक भिखारिन भिक्षा मांगने के लिए आयी, मैं और मेरी बहन बाहर निकले। भिखारी ने भिक्षा के लिए गुहार लगाई तो मैंने पूछा कि आप भीख मांगते हो। उसने कहा, “हां बेटा”।

फिर मैंने पूछा, “आप कहां से आई हो।” तो उसने जना मोड़ साइड के किसी गांव का नाम बताया।

मैं और मेरी बहन प्रभा दोनों मिलकर भंडार वाले कमरे से एक सूप चावल लेकर उसके पास आया और बोला यह लीजिए चावल कुछ आप रख लीजिएगा और कुछ जेना मोड़ के मेले में रहने वाले बच्चों की मां को भी दे दीजिएगा वह भी भीख ही मांगते थे।

उस औरत की आंखों में पानी भर आया। मैं और मेरी बहन उस सुप को उठा नहीं सक रहे थे इसलिए उनकी आंखों में आंसू देख कर मैंने पूछा क्या आप नहीं ले जा पाओगे?”

तभी मां घर से बाहर आंगन में निकली, स्थिति को देखकर दादी को बुलाई। दादी आकर मुझे और मेरी बहन को घर के पीछे ले गई और मां को इशारा की कि उसे चावल दे दो। शायद मैं उसे थोड़ी सी ही चावल होगी।

hindi story with moral का निष्कर्ष

उस दिन मुझे क्या मिल गया था यह मैं नहीं जानता लेकिन हृदय आनंद से प्रफुल्लित था। एक व्यक्ति का भविष्य और चरित्र इस पर निर्भर करता है कि उसका पालन पोषण किस माहौल में हुआ है और माता-पिता से कैसे संस्कार मिले हैं। बचपन में मिले संस्कारों के वजह से ही किसी व्यक्ति का हृदय फूल सा कोमल या पत्थर सा कठोर बन जाता है।

8 से 10 साल का एक बच्चा जिसे सही गलत की उतनी समझ नहीं है, उसे प्यार, नम्रता, सहनशीलता, करुणा, दया, क्षमा, दान या पुण्य कुछ भी मालूम नहीं लेकिन हृदय में एक ऐसी लौ है जो इस नियत को अर्थात दया की भावना को जगाए रखी है। इंसानों की अहमियत समझने का यह नियत ही शायद परिस्थिति के अनुरूप कभी प्यार कभी करुणा सत्कार दया प्रीत सहनशीलता या किसी अन्य सद्गुण का रूप ले लेती है। मेरी माने तो यही नियत वो बीज है जिससे इंसानियत का जन्म होता है। अब तक के प्राणी जगत में केवल इंसान ही है जो इस नियत को ऐसी भावनाओं को अपना सकता है और अनुकरण कर सकता है शायद इसीलिए मानव को सभी योनियों में श्रेष्ठ कहा गया है। यह कथन सुनकर हमें जितना गर्व महसूस होता है उतना ही हमारा दायित्व पूरे विश्व के प्रति बढ़ जाता है।

आप Kahani with Moral in Hindi यहाँ से भी पढ़ सकते है

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